कुंभकार/कुम्हार/प्रजापति शिल्पकार की कला का सम्मान करते हुए मिट्टी के ही दीप जलाये और सदियों से चली आ रही गौरवशाली परम्परा को जीवन्त रखने में अपना अहम योगदान दें

मिट्टी के दीप जलाकर ही मनाए दीपावली

इस दीपावली के पर्व पर सभी देशवासी मिट्टी के बने दीप जलाये, ताकि उजाला होने से वंचित ना रह जाए किसी कुम्भकार (प्रजापति) का परिवार। तरक्की की इस आधुनिक चकाचौंध में दम तोड़ती जा रही, अपनी सदियों से चली आ रही दीपावली पर मिट्टी के दीप जलाने की पवित्र स्वदेशी गौरवमयी परम्परा को जीवन्त रखने के लिए।
आखिर क्यों करना चाहिए हमें चाइनीज इलेक्ट्रॉनिक लाइट का बहिष्कार ? रात और दिन दिया जले फिर भी अंधियारा है। पांच दिवसीय दीपावली पर्व पर मिट्टी के दीयों का उपयोग करें। कुम्भकार कलात्मक संस्कृति के प्रतीक मिट्टी के दीपों से अयोध्या को लाखों दिये जलाकर रोशन करने में बहुत बड़ा सहयोग किया महान् योगदान दिया था।


केंद्र और राज्य सरकारें भी इस संबंध में गंभीर है और जिला कलेक्टर ने इस बार तो सभी जिलों में कुम्हार समाज के लोगों को मिट्टी के दीपक और बर्तन बेचने के लिए जगह दिये जाने उनसे कोई कर वसूली, चैथ वसूली नहीं करने के निर्देश दिये ताकि उनको प्रोत्साहन मिले। इनकों सरंक्षण देकर प्रशासन ने बहुत ही सराहनीय कार्य किया हैे।
दीपावली पर्व मनाने का समय समय पर उसका स्वरूप बदलता गया लेकिन त्योहार की परंपरा हमेशा चलती रही, वर्तमान आधुनिक युग में नई-नई तकनीक आने के कारण हमारे कुंभकार समाज की सदियों पुरानी सांस्कृतिक माटी कला को जिंदा रखने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। आज शहरों में तो लगभग कुम्हार कला विलुप्त होती जा रही है। लेकिन देश के ग्रामीण क्षेत्र में आज भी ज्यादातर लोग मिट्टी के बर्तन एवं दीप/दीये बनाने के पुस्तैनी धंधे पर ही आश्रित हैं। उनको इस कार्य को अंजाम देने के लिए अर्तार्थ मिट्टी के बर्तन, दिए/दीप बनाने में काम आने वाली मिट्टी एवं ईंधन के लिए बहुत भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। सच पूछो तो इन समस्याओं को देखते हुए हमारी युवा पीढ़ी इस कार्य से मुंह मोड़ने लगी है। फिर भी कुछ परिवार इस कला को जिंदा रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दीपावली पर्व आने की खुशी में उनका पूरा परिवार लगभग दो-तीन महीने की कड़ी मेहनत करके माटी कला के बर्तन व दीपक बनाने का काम करने में जुट जाते हैं और ये दीपावली पर्व के माध्यम से पूरे वर्ष भर के लिए अपने परिवार के पालन पोषण की व्यवस्था करते हैं।


कुम्भकार/कुम्हार/प्रजापति परिवारों का मनोबल बना रहे। इसके लिए इस दिपावली को आप सभी सनातनी धर्म प्रेमी सज्जन मिट्टी के दीपक अधिक से अधिक खरीदें। अपने रिश्तेदारों, इष्ट मित्रों, पड़ोसियों सब लोगों को इसके लिए प्रोत्साहित करें। मिट्टी के दीपको से ही दिवाली को मनाने के लिए तैयारी करें।
यह एक ऐसा त्यौहार है जो सभी के लिए प्रकाश यानी एक नई उम्मीदों के उजाले के साथ आता है। इन्ही उम्मीदों के उजाले को पूरा करने के लिए लोग घरों की साफ.-सफाई के बाद लक्ष्मी, गणेश, कुबेर का पूजन किया करते हैं। इस पूजन कार्य में मिट्टी के दीपकों का उपयोग करें।
इस दीपावली के त्यौहार में कुम्भकार (प्रजापति) का परिवार हैं जो प्रकाश की उम्मीद तो करते हैं लेकिन उनके जीवन में उतना प्रकाश नहीं आ पाता है जितना वह दिन-रात पूरे परिवार के साथ मेहनत करके दूसरों के घरों को प्रकाशित करने का जज्बा रखते हैं।


कुम्भकार के बनाये हुए दिये कम मात्रा में ही सही, पर जलते तो हैं लेकिन इनके मेहनत का उचित पारिश्रमिक नहीं मिलने के कारण इनकी आर्थिक संपन्नता अंधियारे में खोती जा रही हैं और वह कुम्भकार जो मिट्टी में भी जान फूंकने का काम करता है, हाड़-तोड़, जी तोड़ मेहनत करके मिट्टी की जीवंत मूर्ति दिपक तथा कई आकर्षक वस्तुओं-खिलोनों का निर्माण कर लेते हैं। इस उम्मीद में कि इनकी बिक्री होगी और उनकी बहुप्रतीक्षित औपचारिक आवश्यकताओं की पूर्ति होगी।
लेकिन इस चकाचैंध और दिखावे की दुनिया में उनकी यह आकांक्षा अधूरी ही रह जाती है क्योंकि जिस मिट्टी का दीया जीवंत मूर्ति, गमला और कई और भी अन्य जरूरत की वस्तुओं का निर्माण करते है। जिनकी जरूरत होती है। कुंभकार की मेहनत को नजर अंदाज कर अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए लोग चाइनीज लाइट, प्लास्टिक के गमले, प्लास्टिक की मूर्तियां लेकर कर लिया करते हैं।
जिस कारण इनकी सारी मेहनत और उम्मीदों पर पानी फिर जाता है। फिर भी जो समझते हैं कि मिट्टी के दिये जलाने से ही लक्ष्मी का वास्तविक पूजन होता है वह उस मिट्टी के दीये को जरूर लेते हैं और जलाया करते हैं।
कहने का आशय यह है कि कुम्हार वर्ग दूसरों के भलाई और अक्षय निधी के संचय की कामना करते हैं लेकिन इन्हें उचित पारिश्रमिक/मजदूरी नहीं मिल पाती है। जरूरत है इनके जज्बातों को समझने की और मिट्टी के दीये जलाकर बनाने वाले भाई लोगों के जीवन को भी प्रकाश से प्रकाशित करने की लोगों की संकल्पना होनी आवश्यक हैं। ताकि इनका भी परिवार पर्व-त्योहारों में वैसी ही खुशी का अनुभव कर सके जो अन्य समृद्ध साधन संपन्न लोग अनुभव किया करते हैं।
आप सभी देशवासियों से अपील है कि कुंभकार/कुम्हार/प्रजापति शिल्पकार की कला का सम्मान करते हुए मिट्टी के ही दीप जलाये और सदियों से चली आ रही गौरवशाली परम्परा को जीवन्त रखने में अपना अहम योगदान दें ताकि सदियों पुरानी हमारी माटी कला को नया जीवन मिल सके।
-विशन सिंह प्रजापति
(ये लेखक के अपने विचार हैं)