आओ जाने रक्षाबंधन का समय और पूजा विधि एवं प्रचलित कथाएं

पूर्णिमा व्रत आज 21 अगस्त को और रक्षाबंधन 22 अगस्त को मनाया जाएगा

22 अगस्त 2021 रक्षाबंधन पर नहीं रहेगी भद्रा

इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा नहीं है। 22 अगस्त की सुबह 5.38 बजे भद्रा खत्म हो जाएगी। इस वजह से दिनभर रक्षाबंधन मनाया जा सकेगा। रक्षाबंधन पर पंचक रहेगा, लेकिन इस त्योहार पर पंचक होना अशुभ नहीं माना जाता है।

सामान्यत: रक्षाबंधन का पर्व श्रवण नक्षत्र में मनाया जाता है, लेकिन इस बार राखी पर धनिष्ठा नक्षत्र रहेगा। गुरु कुंभ राशि में वक्री है और इसके साथ इसी राशि मे चंद्र भी होंगे। इन ग्रहों की युति की वजह से इस बार रक्षाबंधन पर गजकेसरी योग जैसा शुभ योग बन रहा है।

भविष्य पुराण, स्कन्ध पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत आदि पुरातन हिन्दू ग्रंथों में रक्षाबंधन के संबंध मे अनेक कथाएं कही गई है, रक्षाबंधन या रक्षासूत्री किसी से रक्षा हेतु कामना अथवा किसी की रक्षा के लिए कामना करने के लिए बांधी जाती है, इसे दूसरे शब्दों मे इस प्रकार भी कहा जा सकता है ।

रक्षाबंधन में मूलत: दो भावनाएं काम करती रही हैं। प्रथम जिस व्यक्ति के रक्षाबंधन किया जाता है, उसकी कल्याण कामना और दूसरे रक्षाबंधन करने वाले के प्रति स्नेह भावना।

रक्षाबंधन का पर्व संकल्प का पर्व है और संकल्प अपनी बहन की सुरक्षा का

इस प्रकार रक्षाबंधन वास्तव में स्नेह, शांति और रक्षा का बंधन है। इसमें सबके सुख और कल्याण की भावना निहित है।

सूत्र का अर्थ धागा भी होता है, और सिद्धांत या मंत्र भी। पुराणों में देवताओं या ऋषियों द्वारा जिस रक्षासूत्र बांधने की बात की गई हैं, वह धागे की बजाय कोई मंत्र या गुप्त सूत्र भी हो सकता है। धागा तो केवल उसका प्रतीक मात्र है।

रक्षासूत्र बांधने का मंत्र इस प्रकार से है:

येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल:
तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल:।

भावार्थ – जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षाबंधन से मैं तुम्हें बांधता हूं, जो तुम्हारी रक्षा करेगा । हे रक्षे!(रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो।

अर्थात रक्षा सूत्र बांधते समय रक्षा सूत्र बांधने वाला, बहन या फिर ब्राह्मण,पुरोहित अपने यजमान को कहता है कि जिस रक्षासूत्र से दानवों के महापराक्रमी राजा बलि धर्म के बंधन में बांधे गए थे अर्थात् धर्म में प्रयुक्त किए गये थे, उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूं, यानी धर्म के लिए प्रतिबद्ध करता हूं। इसके बाद पुरोहित रक्षा सूत्र से कहता है:-
हे रक्षे तुम स्थिर रहना, स्थिर रहना।

इस प्रकार रक्षा सूत्र का उद्देश्य ब्राह्मणों द्वारा अपने यजमानों को धर्म के लिए प्रेरित एवं प्रयुक्त करना है।

रक्षासूत्र बाँधते समय एक श्लोक और बोला जाता है जो इस प्रकार है:

ॐ यदाबध्नन्दाक्षायणा हिरण्यं, शतानीकाय सुमनस्यमाना:। तन्मSआबध्नामि शतशारदा आयुष्मांजरदृष्टिर्यथासम् ।
रक्षा सूत्र अथवा राखी बनाने तथा बांधने की वैदिक तथा उपयुक्त विधि:
वैदिक राखी निर्माण विधि
रक्षाबंधन के दिन प्रातः काल विधिपूर्वक स्नान करने पश्चात जरा सी पीली सरसों, केसर, चंदन, अक्षत, सोने की तार का टुकड़ा एवं दूर्वा (दूब) इन सभी छः पदार्थो को चुटकी भर मात्रा मे लेकर, छोटे से पीले कपडे मे बांधकर एक छोटी सी पोटली बनाकर इसे एक लाल-पीले धागे मे बांधकर इस शास्त्र सम्मत राखी का निर्माण करे ।
अंत मे एक जल कलश के ऊपर रख कर इस रक्षा सूत्री अर्थात राखी का पूजन करें। इस प्रकार पहले शुभ पदार्थों से राखी का निर्माण और फिर विधिवत पूजा किये जाने से इस सूत्र अर्थात राखी मे दिव्यता अर्थात शुभता का प्रवेश हो जाता है ।
इसके पश्चात थाल में रेशमी वस्त्र, केसर, सरसों,
रोली, चंदन, अक्षत, दही, रक्षा सूत्र (राखी) और मिठाई रखें। साथ में घी का एक दीपक भी रखें।
इसके उपरांत एक जल कलश के ऊपर रख कर इस रक्षा सूत्री अर्थात राखी का पूजन करें। इसके बाद राखी भगवान शिव की प्रतिमा को अर्पित करें।
तत्पश्चात भाई को पूर्व या उत्तर की तरफ मुंह करके बैठायें।
सबसे पहले भाई को तिलक करें, अब भगवान शिव को अर्पित किया गया धागा या राखी भाइयों की कलाई में बांधे, और इसके बाद आरती करें। अंत में मिठाई खिलाकर भाई के सफल एवं स्वस्थ जीवन की मंगल कामना करें।
ध्यान रखें कि राखी बांधते समय भाई बहन का सर खुला नहीं होना चाहिए, आैर रक्षा बंधन पर उपहार में काले वस्त्र, आैर तीखा या नमकीन खाने का सामान न दें।

सामान्य रूप से रक्षासूत्र के तौर पर तीन रंगों लाल, पीले और सफेद धागों का प्रयोग करें। यदि तीनों रंग ना मिलें तो लाल और पीले रंग का धागा तो होना ही चाहिए। उसमें चंदन लगाना अत्यंत शुभ होता है। यदि रक्षा सूत्र ना ला पायें तो कलावे यानि मौली का प्रयोग भी कर सकते हैं।

रक्षाबंधन पर बहन अपने भाई को रक्षासूत्र अपने इष्टदेव के सामने बांधे।

विशेष: सभी मनुष्यों को अपने इष्ट देव यानि भगवान को राखी बांधनी चाहिये । जिनके पास वाहन है तो वह अपने वाहन को, छात्र अपनी पुस्तक आैर लेखनी को, कर्मचारी अपने अपनी रोजी के माघ्यम को तथा व्यापारियों को अपने व्यापार स्थल आैर तकनीशियन को अपनी मशीन पर रक्षा सूत्र अवश्य बांधना चाहिए ।

संस्कृत में एक उक्ति अनुसार:

जनेन विधिना: यस्तु रक्षाबंधनमाचरेत।

स: सर्वदोष: रहित, सुखी संवतसरे भवेत्।।

अर्थात् इस प्रकार विधिपूर्वक जिसके रक्षाबंधन किया जाता है वह संपूर्ण दोषों से दूर रहकर संपूर्ण वर्ष सुखी रहता है।
रक्षाबंधन के संबंध में अनेक कथाएं शास्त्रों मे प्रचारित है, जिनमें से कुछ इस प्रकार से है:

1. यम-यमुना पौराणिक कथाओं के अनुसार, राखी के त्योहार की शुरुआत मृत्यु के देवता यम और उनकी बहन यमुना के बीच रक्षा बंधन से भी मानी जाती है । यमुना ने अपने भाई यम को राखी बांधी थी । यम ने इस पर यमुना को अमरत्व का वरदान दिया ।

2. प्राचीनकाल मे एक बार दानवों और देवताओं में युद्ध शुरू हो गया था। जब दानव देवताओं पर भारी पड़ने लगे तो इन्द्र देवता घबराकर बृहस्पतिदेव के पास गए । वहां बैठी इंद्र की पत्नी इंद्राणी सब सुन रही थी। उन्होंने एक रेशम का धागा मंत्रों की शक्ति से पवित्र कर के अपने पति के हाथ की कलाई पर बांधा था। लोगों का विश्वास है कि इंद्र देवता इस लड़ाई में अपनी पत्नी द्वारा बांधे गए इसी पवित्र धागे की मंत्र शक्ति से विजयी हुए थे। उस दिन भी श्रावण पूर्णिमा का दिन बताया गया है और तभी से यह धागा बांधने की प्रथा चली आ रही है, जिसे रक्षाबंधन के नाम से जाना जाता है।

3. एक समय दानवेन्द्र राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयत्न किया तो इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। तब भगवान ने वामन अवतार लेकर ब्राहमण का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंचे। गुरु के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी। भगवान ने तीन पग में सारा आकाश,पाताल और धरती नाप कर राजा बलि को रसातल में भेज दिया।

जब बलि रसातल चला गया तो उसने अपने तप से भगवान को रात- दिन अपने पास रहने का वचन ले लिया । भगवान विष्णु के घर न लौटने से परेशान लक्ष्मी जी को देवर्षि नारद ने एक उपाय सुझाया । नारद की सलाह के अनुसार लक्ष्मीजी राजा बलि के पास गई और उन्हें राखी बांधकर अपना भाई बना लिया । उसके बाद अपने पति भगवान विष्णु और बलि को अपने साथ लेकर वापस स्वर्ग लोक चली गईं । उस दिन भी श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि ही बताई गई है।

4. द्वापर युग के महाभारत काल मे रक्षाबंधन से संबंधित कृष्ण और द्रौपदी का एक और वृत्तांत मिलता है। जब कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया तब उनकी तर्जनी में चोट आ गई थी। द्रौपदी ने उस समय अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर उनकी उँगली पर पट्टी बंधी थी। यह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। कृष्ण ने इस उपकार का ऋण बाद में द्रौपदी चीरहरण के समय उनकी साड़ी को बढ़ाकर चुकाया। माना जाता है कि एक दूसरे की रक्षा और सहयोग की भावना रक्षाबंधन के पर्व की शुरुआत इसी घटना से हुई है।

5. कर्णावती-हुमायूं प्रसंग: मेवाड़ के महाराजा राणा सांगा की मृत्यु के बाद बहादुर शाह ने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया । इससे चिंतित रानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूं को एक पत्र भेजा । इस पत्र के साथ कर्णावती ने हुमायूं को भाई मानते हुए एक राखी भी भेजी और उनसे सहायता मांगी । मुगल बादशाह हुमायूं बहन कर्णावती की रक्षा के लिए समय पर नहीं पहुंच पाया था, लेकिन उसने कर्णावती के बेटे विक्रमजीत को मेवाड़ की रियासत लौटाने में मदद की थी ।